परिचय
- विकसित भारत – रोज़गार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 एक नया क़ानून है, जिसे सरकार ने ग्रामीण रोज़गार व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने के लिए बनाया है। यह क़ानून पुराने MGNREGA की जगह लाया गया है और विकसित भारत @2047 के लक्ष्य से जुड़ा हुआ है। इसे 16 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पेश किया गया, संसद से पास हुआ और 21 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। सरकार का कहना है कि अब ग्रामीण रोज़गार सिर्फ़ संकट से निपटने के लिए नहीं, बल्कि विकास और आजीविका का ज़रिया बनेगा।
पृष्ठभूमि (Background)
- सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में ग्रामीण गरीबी काफ़ी कम हुई है। जब हालात बेहतर हुए हैं, तो सरकार का मानना है कि अब सिर्फ़ राहत वाली योजनाओं से आगे बढ़कर काम से विकास पर ध्यान देना चाहिए। इसी सोच के तहत यह नया क़ानून लाया गया है, जिसमें रोज़गार के साथ-साथ पानी, सड़क, गांव की संपत्ति और बुनियादी ढांचे पर ज़ोर दिया गया है।
इस क़ानून में क्या नया है?
- अब हर ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिन का काम मिलने की गारंटी होगी।
- यह काम ज़्यादातर शारीरिक और अकुशल श्रम से जुड़ा होगा।
- काम हर जगह नहीं, बल्कि सिर्फ़ उन ग्रामीण इलाकों में मिलेगा जिन्हें केंद्र सरकार अधिसूचित करेगी।
- योजना नीचे से ऊपर बनेगी, यानी पहले ग्राम पंचायत, फिर ब्लॉक, ज़िला और राज्य स्तर पर योजना तैयार होगी।
- खेती के व्यस्त मौसम (बुवाई और कटाई) के समय राज्य सरकारें योजना को कुछ दिनों के लिए रोक भी सकती हैं।
- अगर 15 दिन के अंदर काम नहीं मिला, तो मज़दूर को बेरोज़गारी भत्ता मिलेगा।
- प्रशासनिक खर्च की सीमा बढ़ाई गई है, ताकि स्टाफ, ट्रेनिंग और तकनीक बेहतर हो सके।
MGNREGA से क्या फर्क है?
- MGNREGA में मज़दूर जब चाहे काम मांग सकता था, लेकिन नया क़ानून बजट और योजना पर आधारित है। पहले यह अधिकार की तरह था, अब यह ज़्यादा सरकारी योजना जैसा हो गया है।
- इसके अलावा, अब केंद्र और राज्य मिलकर खर्च उठाएंगे, जिससे कुछ गरीब राज्यों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। खेती के मौसम में योजना रोकने का प्रावधान भी नया है।
कैसे लागू होगा?
- यह योजना केंद्र और राज्य सरकार मिलकर चलाएंगी। हर राज्य को पहले से बताया जाएगा कि उसे कितना बजट मिलेगा। ग्राम पंचायत स्तर पर बनाई गई योजनाओं पर निगरानी रखी जाएगी। आपदा जैसी स्थिति में सरकार कुछ छूट भी दे सकती है।
फ़ायदे क्या हैं?
- गांवों में सड़क, पानी, तालाब, ढांचा जैसे काम होंगे।
- रोज़गार के साथ स्थायी संपत्ति बनेगी।
- दूसरी योजनाओं से जुड़ने पर लोगों को अलग-अलग तरह की आजीविका मिलेगी।
- 125 दिन का काम मिलने से आय में स्थिरता आएगी।
आलोचनाएं क्या हैं?
- विपक्ष और विशेषज्ञों का कहना है कि इससे मज़दूरों का अधिकार कमजोर हो सकता है।
- काम हर जगह न मिलने से सबसे गरीब लोग बाहर रह सकते हैं।
- खेती के मौसम में योजना रुकने से आमदनी पर असर पड़ सकता है।
- बजट सीमा होने से आपात हालात में मदद कम पड़ सकती है।
निष्कर्ष
यह क़ानून ग्रामीण भारत को मज़बूत बनाने की कोशिश है, जिसमें रोज़गार के साथ विकास पर ज़ोर दिया गया है। लेकिन साथ ही यह ज़रूरी है कि मज़दूरों के अधिकार सुरक्षित रहें और सबसे गरीब परिवार बाहर न छूटें। अगर इसे सही और ईमानदारी से लागू किया गया, तो यह गांवों की तस्वीर बदल सकता है।